आख़िरी मुलाकात - Hindi Kahani | Moral Story in hindi
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| आखिरी मुलाकात - हिंदी कहानी |
प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर बैठा रघुवीर प्रसाद बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। शाम ढल रही थी और स्टेशन पर यात्रियों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। कोई किसी को विदा कर रहा था, कोई किसी के स्वागत में फूल लिए खड़ा था, लेकिन रघुवीर की दुनिया इन सबसे अलग थी। उनकी जेब में रखा एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफाफा बार-बार उनका ध्यान अपनी ओर खींच रहा था। यह कोई साधारण पत्र नहीं था, बल्कि उनकी अधूरी कहानी की आख़िरी निशानी था। आज चालीस वर्षों बाद वह उसी कहानी के अंतिम अध्याय से मिलने जा रहे थे।
रघुवीर को याद आया कि जब वह कॉलेज में पढ़ते थे, तब उनकी मुलाकात सुमन से हुई थी। सुमन कोई फिल्मी नायिका जैसी सुंदर नहीं थी, लेकिन उसकी मुस्कान में एक ऐसी सादगी थी जो सीधे दिल में उतर जाती थी। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे प्रेम में बदल गई। उस दौर में प्रेम का मतलब घंटों मोबाइल पर बातें करना नहीं था। एक-दूसरे को देखने के लिए भी दिनभर इंतज़ार करना पड़ता था और एक छोटी-सी चिट्ठी लिखने में कई रातों की हिम्मत जुटानी पड़ती थी। कॉलेज के पीछे खड़े पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर दोनों अपने भविष्य के सपने बुनते थे। एक छोटा-सा घर, आँगन में तुलसी का पौधा और साथ-साथ बूढ़े होने का सपना।
लेकिन ज़िंदगी सपनों के हिसाब से नहीं चलती।
सुमन के पिता ने उसकी शादी एक बड़े व्यापारी से तय कर दी। रघुवीर उस समय एक साधारण परिवार का संघर्षरत युवक था। उसके पास प्रेम तो था, लेकिन समाज के सामने प्रेम की कोई कीमत नहीं थी। जिस दिन सुमन की शादी तय हुई, वह रोती हुई रघुवीर से मिलने आई थी। उसके हाथ में एक पत्र था। काँपते हाथों से उसने वह पत्र रघुवीर को दिया और कहा था, "अगर किस्मत ने चाहा तो फिर मिलेंगे, नहीं तो इसे मेरी आख़िरी निशानी समझ लेना।" उस दिन दोनों ने बहुत रोया था, लेकिन आँसू तकदीर नहीं बदल सके। सुमन चली गई और रघुवीर के जीवन का सबसे खूबसूरत अध्याय अधूरा रह गया।
समय बीतता गया। रघुवीर ने भी परिवार के दबाव में शादी कर ली। नौकरी मिली, बच्चे हुए, घर बना और जीवन आगे बढ़ता रहा। बाहर से सब कुछ सामान्य था, लेकिन भीतर कहीं एक खालीपन हमेशा बना रहा। उधर सुमन भी अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गई। धीरे-धीरे दोनों के बीच का हर संपर्क समाप्त हो गया। बस वह एक पत्र था, जिसे रघुवीर ने आज तक अपनी सबसे कीमती धरोहर की तरह संभालकर रखा था।
फिर तीन दिन पहले अचानक एक अनजान नंबर से फोन आया। दूसरी तरफ़ एक लड़की थी, जिसने अपना परिचय सुमन की बेटी के रूप में दिया। उसकी आवाज़ भर्रा रही थी। उसने बताया कि सुमन बहुत बीमार है और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। मरने से पहले वह एक बार रघुवीर से मिलना चाहती है। फोन कटने के बाद रघुवीर सारी रात सो नहीं पाए। चालीस साल पुरानी यादें उनके सामने किसी चलचित्र की तरह घूमती रहीं।
अगले दिन वह उसी शहर के अस्पताल में थे जहाँ सुमन भर्ती थी। कमरे का दरवाज़ा खोलते ही उनकी नज़र बिस्तर पर लेटी एक कमजोर और झुर्रियों से भरे चेहरे वाली वृद्धा पर पड़ी। समय ने दोनों के चेहरे बदल दिए थे, लेकिन पहचान नहीं मिटा पाया था। सुमन ने जैसे ही उन्हें देखा, उसकी आँखों में आँसू भर आए। "तुम आ गए..." उसने धीमे से कहा। रघुवीर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गए। दोनों के पास कहने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन शब्द जैसे कहीं खो गए थे।
कुछ देर की चुप्पी के बाद सुमन ने धीमे स्वर में कहा, "जानते हो, मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।" रघुवीर की आँखें नम हो गईं। उन्होंने भी स्वीकार किया कि वह भी कभी उसे भूल नहीं पाए। सुमन मुस्कुराई और बोली, "कई बार सोचती थी, अगर उस समय थोड़ा साहस किया होता तो शायद हमारी कहानी कुछ और होती।" रघुवीर ने सिर हिलाया। "नहीं, शायद कहानी वही होती जो किस्मत ने लिखी थी।"
खिड़की से आती ढलते सूरज की किरणें कमरे में फैल रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे समय स्वयं उनके बीच बैठा उनकी बातें सुन रहा हो। सुमन ने काँपता हुआ हाथ आगे बढ़ाया। रघुवीर ने उसे थाम लिया। यह वही हाथ था जिसे पकड़कर कभी उन्होंने पूरी जिंदगी साथ चलने का सपना देखा था। दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन अब उनमें शिकायत नहीं थी, केवल एक गहरी शांति थी।
कुछ क्षण बाद सुमन ने कहा, "अगर अगला जन्म हुआ और हम फिर मिले... तो इस बार देर मत करना।" रघुवीर की आवाज़ भर्रा गई। उन्होंने उसका हाथ कसकर पकड़ते हुए कहा, "इस बार तुम्हें कभी जाने नहीं दूँगा।"
सुमन के होंठों पर एक हल्की मुस्कान तैर गई। वही मुस्कान जिसने कभी एक युवा लड़के का दिल जीत लिया था। अगले ही पल उसकी पलकों ने धीरे-धीरे आँखों को ढँक लिया। साँसों की डोर टूट चुकी थी।
रघुवीर बहुत देर तक वहीं बैठे रहे। उनकी हथेली में अब भी सुमन के स्पर्श की गर्माहट महसूस हो रही थी। जब वह अस्पताल से बाहर निकले, तब रात हो चुकी थी। आसमान में एक अकेला तारा चमक रहा था। उन्होंने जेब से वह पुराना पत्र निकाला और उसे सीने से लगा लिया।
उस क्षण उन्हें एहसास हुआ कि कुछ प्रेम कहानियाँ विवाह तक नहीं पहुँचतीं, कुछ रिश्ते अधूरे रह जाते हैं, लेकिन उनका अधूरापन ही उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती बन जाता है। क्योंकि कुछ मुलाकातें आख़िरी होकर भी कभी खत्म नहीं होतीं। वे याद बनकर जीवनभर हमारे साथ चलती रहती हैं।

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