गंगा स्नान - Ganga Snan - Hindi Kahani | Moral Story in hindi
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डमरू-सी हिलती गर्दन वाली पारो
गाँव के छोर पर, कच्ची पगडंडी के पास, एक टेढ़े-मेढ़े दरवाज़े वाला छोटा-सा घर था। उसी में रहती थी सत्तर वर्ष की पारो। दस साल पहले पति चला गया था। उससे भी बड़ा आघात तब लगा, जब उसके दोनों जवान बेटे एक-एक कर दुनिया छोड़ गए।
अब उसके पास था तो बस एक पुरानी सिलाई मशीन — लोहे की, काली, जगह-जगह से घिसी हुई। वही उसकी रोज़ी थी, वही उसका सहारा।
सुबह की पहली किरण के साथ ही उसकी मशीन की चर्र-चर्र शुरू हो जाती। सिलाई करते समय उसकी कमजोर गर्दन डमरू की तरह हिलती रहती। आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ाए वह कपड़ों की सिलाई में ऐसे डूबी रहती मानो हर टांका उसके जीवन की टूटी कड़ियों को जोड़ रहा हो।
कोई पैसे नहीं देता था। कोई चावल की मुट्ठी छोड़ जाता, तो कोई गेहूँ या बाजरा। कभी आधा पेट भरता, कभी चौथाई। पर पारो के चेहरे पर शिकायत की रेखा नहीं दिखती थी।
दरवाजे के सामने से जो भी निकलता, वह धीमी लेकिन साफ आवाज़ में कहती—
“राम-राम!”
लोग उसे दया की दृष्टि से देखते। कई बार कोई कह देता—
“दादी, तुम्हारी हालत देखकर मन पसीज जाता है।”
पारो को ऐसे शब्दों से चिढ़ थी।
“मुझ पर तरस मत खाओ,” वह मन ही मन बुदबुदाती, “भगवान ने हाथ दिए हैं, जब तक चल रहे हैं, किसी के आगे क्यों झुकूँ?”
छोटे-छोटे बच्चे उसके दरवाज़े पर आकर शोर मचाते, उसकी मशीन के पैडल को छूकर भाग जाते। पर पारो कभी डाँटती नहीं। उल्टे मुस्कुरा देती—
“अरे शैतानों, गिरोगे तो रोते फिरोगे!”
बच्चों की खिलखिलाहट उसे अपने खोए बेटों की याद दिलाती, पर वह आँसू पी जाती।
एक दिन गाँव के प्रधान जी घर-घर जाकर कन्या पाठशाला के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे। जब वे पारो के घर पहुँचे, तो उसकी हालत देखकर ठिठक गए।
“क्यों दादी,” उन्होंने नरम स्वर में कहा, “तुम हाँ कर दो तो तुम्हें बुढ़ापा पेंशन दिलवाने की कोशिश करूँ।”
पारो जैसे तीर से घायल हो गई। उसकी आँखों में हल्की आग चमकी।
“भगवान ने दो हाथ दिए हैं। मेरी मशीन आधा पेट रोटी दे ही देती है। मैं किसी के आगे हाथ क्यों फैलाऊँगी? क्या तुम यही कहने आए थे?”
प्रधान जी सकुचा गए।
“न-नहीं दादी… मैं तो कन्या पाठशाला बनवाने के लिए चंदा लेने आया था। पर तेरी हालत देखकर…”
“तू कन्या पाठशाला बनवाएगा?”
झुर्रियों भरे चेहरे पर अचानक ऐसी चमक आई जैसे बरसों बाद सुबह की धूप उतर आई हो।
“हाँ दादी, एक दिन जरूर बनवाऊँगा। बस तेरा आशीर्वाद चाहिए।”
पारो धीरे-धीरे घुटनों का सहारा लेकर उठी। दीवार के ताक पर रखी जंग लगी छोटी-सी संदूकची उतारी। उसे खोलने में जैसे पूरा अतीत खुल रहा था। काफी देर टटोलने के बाद एक पुराना बटुआ निकला।
उसने काँपते हाथों से उसमें से तीन सौ रुपये निकाले और प्रधान जी की हथेली पर रख दिए।
प्रधान जी चौंक गए—
“दादी! ये क्या? तेरी हालत… ये पैसे?”
पारो की आवाज़ में अद्भुत शांति थी—
“बेटे, सोचा था मरने से पहले गंगा नहाने जाऊँगी। उसी के लिए जोड़कर रखे थे।”
“तो अब नहीं जाओगी?”
पारो मुस्कुराई।
“तू पाठशाला बनवाएगा। इससे बड़ा गंगा-स्नान और क्या होगा?”
प्रधान जी की आँखें नम हो गईं। वे कुछ क्षण निःशब्द खड़े रहे। उस दिन उन्हें लगा—दान संपत्ति से नहीं, मन की विशालता से होता है।
दिन बीतते गए। गाँव में ईंटें आने लगीं। नींव खुदी। लोग पहले हँसते थे—
“अरे, यहाँ कौन लड़की पढ़ेगी?”
पर धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा। जब भी प्रधान जी थकते, पारो के घर जाकर उसके चरण छूते। वह कहती—
“काम मत रोकना बेटा। ये मंदिर बन रहा है।”
महीनों बाद पाठशाला की इमारत तैयार हो गई। उद्घाटन के दिन गाँव भर के लोग इकट्ठा हुए। रंग-बिरंगी चुनरियों में सजी नन्ही लड़कियाँ कतार में खड़ी थीं। उनके हाथों में किताबें थीं, आँखों में सपने।
प्रधान जी ने मंच से कहा—
“इस पाठशाला की नींव तीन सौ रुपये से पड़ी थी… जो इस गाँव की सबसे गरीब, पर सबसे अमीर महिला ने दिए थे।”
भीड़ की निगाहें पारो की ओर मुड़ गईं। वह दूर खड़ी थी, अपनी मशीन के सहारे। उसकी गर्दन आज भी डमरू की तरह हिल रही थी, पर आँखों में गंगा की धारा बह रही थी।
एक नन्ही बच्ची दौड़कर उसके पास आई और बोली—
“दादी, मैं बड़ी होकर मास्टरनी बनूँगी!”
पारो ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बस पढ़-लिख लेना बेटी… यही मेरी गंगा है।”
मोरल
सच्चा गंगा-स्नान नदी में डुबकी लगाने से नहीं,
बल्कि किसी के जीवन में उजाला भरने से होता है।
दान अमीरी से नहीं,
हिम्मत और नीयत से होता है।
जिसके पास देने को कुछ नहीं लगता,
अक्सर वही सबसे बड़ा दानी निकलता है।
और याद रखो— गरीबी संसाधनों की होती है, विचारों की नहीं।

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