कर्मों का हिसाब - Hindi Kahani | Moral Story in hindi

कर्मों का हिसाब - Hindi Kahani | Moral Story in hindi

Story in hindi 


रात के साढ़े दस बजे थे। अस्पताल की इमरजेंसी में अचानक अफरा-तफरी मच गई। स्ट्रेचर तेजी से अंदर लाया जा रहा था। सफेद चादर खून से भीग चुकी थी। नर्सें दौड़ रही थीं, वार्ड बॉय रास्ता साफ कर रहे थे।

“सड़क दुर्घटना… हालत गंभीर है!” किसी ने आवाज़ लगाई।

अस्पताल के मालिक और वरिष्ठ सर्जन डॉ. अरविंद मेहरा अपने केबिन से लगभग भागते हुए आईसीयू की ओर बढ़े। वर्षों का अनुभव उनके चेहरे पर ठहराव लाता था, पर उस रात उनकी चाल में असाधारण तत्परता थी। उन्होंने बिना समय गंवाए मरीज की नब्ज देखी, रिपोर्ट सुनी और तुरंत निर्देश दिया—

“ऑपरेशन थिएटर तैयार करो। जो भी ज़रूरी हो, करो। किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए।”

एक क्षण रुककर उन्होंने सख़्त आवाज़ में जोड़ा— “और हाँ… पैसों की बात अभी कोई नहीं करेगा।”

ऑपरेशन लंबा चला। बाहर प्रतीक्षालय में सन्नाटा पसरा रहा। अंततः सर्जरी सफल हुई, पर खतरा पूरी तरह टला नहीं था। अगले पंद्रह दिन मरीज आईसीयू और फिर प्राइवेट वार्ड में रहा। डॉ. अरविंद रोज़ स्वयं राउंड लेते, फाइल देखते, नर्सों से पूछते—

“दवा समय पर? दर्द तो नहीं है? कोई शिकायत?”

स्टाफ समझ नहीं पा रहा था कि डॉक्टर इस मरीज को लेकर इतने सजग क्यों हैं। पर किसी ने पूछने की हिम्मत नहीं की।

पंद्रहवें दिन मरीज की हालत स्थिर हो गई। डिस्चार्ज की तैयारी शुरू हुई। अकाउंट विभाग ने बिल बनाया—तीन लाख चौवन हज़ार रुपये।

बिल डॉक्टर की टेबल पर पहुँचा। उन्होंने ध्यान से देखा, फिर घंटी दबाकर अकाउंट मैनेजर को बुलाया।

“इस मरीज से एक पैसा नहीं लेना है।”

मैनेजर चौंक गया— “सर… तीन लाख से ऊपर का बिल है। अगर ऐसे…?”

डॉक्टर ने शांत पर दृढ़ स्वर में कहा— “दस लाख भी हो तो नहीं लेना।”


“लेकिन सर—”

“उसे व्हीलचेयर पर मेरे चेंबर में लाओ। और तुम भी साथ रहना।”

कुछ ही देर में मरीज अंदर लाया गया। दुबला चेहरा, माथे पर हल्की चोट का निशान, पर आँखों में विनम्रता। उसका नाम था—प्रवीण।

डॉक्टर कुर्सी से उठे, सामने आकर खड़े हो गए।


“प्रवीण भाई… मुझे पहचानते हो?”

प्रवीण ने गौर से देखा। “लगता तो है… कहीं देखा है… पर याद नहीं आ रहा, साहब।”

डॉक्टर की आँखों में पुरानी स्मृति उतर आई।

“तीन साल पहले की बात है। मेरा परिवार पिकनिक से लौट रहा था। पहाड़ी रास्ता था। अचानक हमारी कार बंद हो गई। बोनट से धुआँ निकलने लगा। शाम ढल रही थी। चारों तरफ घना जंगल… सुनसान इलाका…”

प्रवीण की आँखों में हलचल हुई।

डॉक्टर आगे बोले— “मेरी पत्नी, मेरी बेटी… मेरा छोटा बेटा… सब डरे हुए थे। अंधेरा घिर रहा था। हम भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि कोई मदद मिल जाए।”


उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा— “तभी एक युवक बाइक पर वहाँ आया। मैले कपड़े, हाथ में औज़ारों का छोटा सा बैग। हमने हाथ उठाकर उसे रोका। वह तुम थे, प्रवीण।”


प्रवीण अब पूरी तरह याद कर चुका था। “ओह… साहब… वो आप थे?”

डॉक्टर ने सिर हिलाया। “तुमने बिना हिचक कार का बोनट खोला। देर तक झुककर कुछ ठीक किया। फिर इंजन स्टार्ट हुआ… और हमारे चेहरों पर जैसे जान लौट आई।”


डॉक्टर की आवाज़ भर्रा गई— “मैंने जेब से बटुआ निकाला था। तुम्हें पैसे देने चाहे थे। कहा था—‘बताओ कितना दूँ?’”


प्रवीण ने धीमे से कहा— “मैंने मना कर दिया था…”


डॉक्टर की आँखों में चमक आ गई— “हाँ। तुमने कहा था— ‘मुश्किल में पड़े इंसान से मैं मजदूरी नहीं लेता। मेरी मजदूरी का हिसाब भगवान रखते हैं।’”


चेंबर में कुछ पल के लिए पूर्ण सन्नाटा छा गया।


डॉक्टर कुर्सी पर बैठ गए। “उस दिन तुम्हारे शब्द मेरे भीतर उतर गए। मैं डॉक्टर हूँ। पैसा कमाता हूँ। पर उस रात पहली बार समझ आया—असली कमाई नोटों से नहीं, कर्म से होती है।”


उन्होंने धीरे से कहा— “मैंने उसी दिन तय किया कि संकट में पड़े लोगों से, जिनकी हालत सच में मजबूर हो, उनसे कभी पैसे नहीं लूँगा। तुम्हारी बात मेरे जीवन का सिद्धांत बन गई।”


अकाउंट मैनेजर अवाक् खड़ा था। डॉक्टर ने उसकी ओर देखते हुए कहा— “बिल कैंसिल करो। शून्य लिखो।”


प्रवीण घबरा गया— “नहीं साहब, ऐसा मत कीजिए। आपका जो खर्चा है—”


डॉक्टर ने हाथ उठाकर रोक दिया— “यह अस्पताल मेरा है। तुम यहाँ मेरे मेहमान बनकर आए हो। तीन साल पहले तुमने मेरी सबसे बड़ी पूँजी—मेरे परिवार की सुरक्षा—बचाई थी। आज मुझे तुम्हारा कर्ज़ चुकाने का अवसर मिला है।”

उन्होंने दीवार पर टंगी भगवान कृष्ण की तस्वीर की ओर देखा—

“मैं अक्सर प्रार्थना करता था कि जिसने मुझे यह सीख दी, उसे लौटाने का मौका मिले। आज वही दिन है।”

प्रवीण की आँखों से आँसू बह निकले। उसने व्हीलचेयर से उठकर तस्वीर के सामने हाथ जोड़ दिए।

“हे प्रभु… आपने मेरे कर्म का हिसाब ब्याज समेत चुका दिया।”


डॉक्टर मुस्कुराए— “कर्म का लेखा ऊपर वाला रखता है, प्रवीण भाई। हम समझते हैं कि हमने भला किया और बात खत्म। पर नहीं… हर अच्छा काम कहीं दर्ज होता है।”

उन्होंने अकाउंट मैनेजर से कहा— “याद रखो, सीख देने के लिए कोई बड़ा गुरु होना जरूरी नहीं। कभी-कभी एक साधारण इंसान ही जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक बन जाता है।”

फिर प्रवीण की ओर मुड़कर बोले— “अब तुम आराम से घर जाओ। और याद रखना—कभी भी कोई तकलीफ हो, तो बिना संकोच मेरे पास आना।”

प्रवीण ने नम आँखों से कहा— “समय सच में बदलता रहता है, साहब।”

डॉक्टर ने उत्तर दिया—“हाँ, समय बदलता है। पर कर्म का हिसाब कभी नहीं बदलता।”

उस दिन अस्पताल से सिर्फ एक मरीज डिस्चार्ज नहीं हुआ— एक सिद्धांत फिर से जीवित हुआ।


जो हम कठिन समय में बिना स्वार्थ के देते हैं, वह कई गुना होकर लौटता है।


क्योंकि

ईश्वर कभी देर कर सकता है—

पर कर्म का हिसाब अधूरा नहीं छोड़ता।

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