चमत्कार - Hindi Kahani | Moral Story in hindi
मासूम गुड़िया नींद से उठी तो सबसे पहले उसने तकिए के नीचे हाथ डाला।
नहीं मिला।
उसने बिस्तर से उतरते ही कमरे में इधर-उधर देखा।
फिर अपनी तोतली आवाज़ में माँ को पुकारा—
“माँ… मेला गुल्लक कहाँ गया?”
माँ रसोई और चिंता के बीच फँसी हुई थीं।
उनकी आँखों में कई रातों की नींद जमा नहीं थी।
बिना पलटे उन्होंने अलमारी से गुल्लक उतार कर दे दिया—
“ले बेटा… यहीं रखा था।”
माँ फिर अपने काम में लग गईं…
और गुड़िया अपने इरादे में।
वह गुल्लक को सीने से लगाए,
चुपचाप घर से बाहर निकल आई।
आज सुबह की हवा भी भारी थी।
गली के कोने पर बना छोटा-सा मंदिर,
जहाँ रोज़ घंटियों की आवाज़ से दिन शुरू होता था,
आज कुछ ज़्यादा ही भरा हुआ था।
गुड़िया छोटी थी…
भीड़ उसके लिए बड़ी थी।
फिर भी वह किसी तरह
बाल-गोपाल की मूर्ति के सामने पहुँच गई।
गुल्लक को दोनों हाथों से पकड़े हुए
उसने पंडित जी की ओर देखा और बोली—
“बाबा… जला कान्हा को बाहल बुलाना…”
पंडित जी मुस्कुरा दिए—
“अरे बेटा, कान्हा अभी सो रहे हैं… बाद में आना।”
पर गुड़िया कहाँ मानने वाली थी।
वह ज़ोर से चिल्लाई—
“कान्हा उठो… जल्दी कलो… बाहल आओ!”
मंदिर में अचानक सन्नाटा छा गया।
सबकी नज़रें उस छोटी-सी बच्ची पर टिक गईं।
गुड़िया की आँखों में आँसू तैर रहे थे—
“पंडित जी… प्लीज… प्लीज कान्हा को उठा दीजिये…”
पंडित जी झुककर बोले—
“बताओ बेटा, क्या चाहिए तुम्हें कान्हा से?”
गुड़िया ने गुल्लक ऊपर उठाया—
“मुझे चमत्काल चाहिए…”
फिर मासूमियत से बोली—
“इसके बदले में मैं कान्हा को अपना ये गुल्लक दे दूँगी…
इसमें पूरे 100 लूपये हैं।
कान्हा इससे अपने लिए माखन खलीद सकता है…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई—
“इतने देल तक कोई छोता है क्या?”
पंडित जी गंभीर हो गए—
“चमत्कार?
किसने कहा कि कान्हा चमत्कार करता है?”
गुड़िया ने आँसू पोंछे—
“कल लात मम्मा-पापा बात कल लहे थे…
भैया के ऑपलेछन के लिए 10 लाख लूपये चाहिए…”
उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी…
पर दर्द बहुत बड़ा।
“हम अपना गहना… जमीन… सब बेच चुके हैं…
नाते-लिश्तेदार भी फोन नहीं उठाते…
अब कान्हा का चमत्काल ही भैया को बचा सकता है…”
मंदिर के कोने में खड़ा एक व्यक्ति
यह सब बड़े ध्यान से सुन रहा था।
वह आगे आया—
“बेटा… क्या हुआ है तुम्हारे भैया को?”
गुड़िया ने बिना झिझक कहा—
“भैया को ब्लेन ट्यूमल है…”
“ब्रेन ट्यूमर?”
वह चौंका।
“जी अंकल…
बहुत खतल्नाक बिमाली होती है…”
वह आदमी चुपचाप
बाल-गोपाल की मूर्ति को देखने लगा।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
रुँधे गले से वह बोला—
“अच्छा…
तो तुम वही बच्ची हो…”
गुड़िया ने मासूमियत से देखा—
“कौन सी?”
“कान्हा ने बताया था…
कि आज सुबह तुम यहाँ मिलोगी।”
वह झुका, मुस्कुराया—
“मेरा नाम ही चमत्कार है बेटा।”
फिर बोला—
“लाओ… ये गुल्लक मुझे दे दो…
और मुझे अपने घर ले चलो…”
गुड़िया को समझ नहीं आया,
पर दिल को भरोसा हो गया।
वह आदमी लंदन का
प्रसिद्ध न्यूरो-सर्जन था।
भारत अपने माँ-बाप से मिलने आया था।
गुड़िया के गुल्लक में पड़े सिर्फ 100 रुपये में
उसने गुड़िया के भैया की ज़िंदगी खरीद ली। ऑपरेशन सफल हुआ। भैया बच गया।
जब गुड़िया ने भैया को मुस्कुराते देखा, तो उसने कान्हा की ओर हाथ जोड़ दिए—
“देखा… मैं बोली थी न… कान्हा चमत्काल कलता है…”
कभी- कभी ईश्वर चमत्कार नहीं करता… वह किसी इंसान को चमत्कार बनाकर भेज देता है।
और कभी-कभी एक बच्चे का विश्वास , सौ रुपयों को दस लाख की उम्मीद में बदल देता है।

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