आखिरी कॉल | Hindi Kahani | Moral Story in hindi

आखिरी कॉल | Hindi Kahani | Moral Story in hindi

Hindi Kahaniya 


रात के ठीक ढाई बजे आर्या का फोन बजा।

नींद में डूबी आर्या ने करवट बदलते हुए फोन उठाया, “हेलो…?”

उधर से कुछ सेकंड तक सिर्फ तेज सांसों की आवाज़ आती रही। फिर एक कमजोर, कांपती हुई आवाज सुनाई दी—

“बेटा… ज़रा जल्दी आ जाओ… तुम्हारी अम्मा सांस नहीं ले पा रही…”

आर्या एकदम उठकर बैठ गई।

“कौन…? आप किससे बात करना चाहते हैं?”

“राघव से… मेरा बेटा… उसने कहा था नंबर इसी डायरी में लिखा है… शायद गलत लग गया…”

आवाज़ इतनी टूटी हुई थी कि आर्या का दिल धक से रह गया।

“आप कहाँ रहते हैं बाबूजी?”

उधर से बूढ़े आदमी ने धीरे-धीरे पता बताया। बीच-बीच में उसकी खांसी आवाज़ को निगल जाती थी।

“बेटा… घर में दवा भी खत्म हो गई है… और अम्मा सुबह से कुछ खाई भी नहीं…”

आर्या ने घड़ी देखी। रात के ढाई बजे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी।

उसने तुरंत एंबुलेंस को फोन किया और खुद भी कार लेकर निकल पड़ी।

करीब बीस मिनट बाद वह पुराने शहर की एक तंग गली में पहुंची। एंबुलेंस पहले से खड़ी थी। बाहर कुछ लोग जमा थे।

आर्या तेजी से अंदर गई।

कमरे में घुसते ही उसके कदम वहीं जम गए।

एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर एक बुजुर्ग महिला निश्चल पड़ी थी। चेहरे पर अजीब सी शांति थी। पास ही जमीन पर एक बूढ़ा आदमी गिरा पड़ा था। उसके हाथ में पुरानी टेलीफोन डायरी खुली हुई थी… और उंगलियाँ अब भी एक नंबर पर टिकी थीं।

डॉक्टर धीरे से बोला, “मैडम… दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं।”

आर्या की आंखें फैल गईं।

“लेकिन… लेकिन अभी आधे घंटे पहले तो इनसे मेरी बात हुई थी…”

डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, “मृत्यु को कम से कम चार-पांच घंटे हो चुके हैं।”

आर्या के हाथ कांपने लगे।

उसने मोबाइल निकाला। कॉल लॉग खोला।

लेकिन उसमें कोई नंबर नहीं था।

सिर्फ एक खाली स्क्रीन…

उस रात पहली बार आर्या को डर नहीं… दर्द महसूस हुआ।

पास रखी मेज पर कुछ सूखी दवाइयाँ, खाली डिब्बे और आधी रोटी पड़ी थी। दीवार पर टंगी तस्वीर में वही बुजुर्ग दंपत्ति मुस्कुरा रहे थे… और उनके बीच एक जवान लड़का खड़ा था।

शायद उनका बेटा।

पड़ोसियों से पता चला कि उसका नाम निखिल था। बड़ी कंपनी में नौकरी करता था। तीन साल पहले विदेश चला गया था।

शुरुआत में रोज फोन आता था… फिर हफ्ते में… फिर महीने में…

और पिछले चार महीने से बिल्कुल नहीं।

“बाबूजी रोज शाम को दरवाजे के बाहर बैठते थे,” एक पड़ोसी बोला, “कहते थे… मेरा बेटा बहुत बड़ा आदमी बन गया है… बस काम में फंसा होगा।”

दूसरी औरत ने आंसू पोंछते हुए कहा, “आंटी तो कई बार भूखी सो जाती थीं… लेकिन किसी से मदद नहीं मांगती थीं।”

आर्या ने कांपते हाथों से निखिल का नंबर मिलाया।

उधर से नींद भरी आवाज आई, “हेलो?”

“क्या आप निखिल बोल रहे हैं?”

“जी… कौन?”

“आपके माता-पिता…”

कुछ सेकंड की चुप्पी रही।

फिर निखिल बोला, “ओह… क्या हुआ उन्हें?” उस “ओह” में चिंता कम… औपचारिकता ज्यादा थी। आर्या का गला भर आया।

“दोनों नहीं रहे।”

उधर से लंबी सांस सुनाई दी। फिर आवाज आई, “देखिए… मैं अभी कनाडा में हूं। अगले हफ्ते बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। मैं तुरंत नहीं आ सकता। आप अंतिम संस्कार करवा दीजिए। मैं बाद में आकर सब देख लूंगा।”

आर्या की आंखों में आंसू उतर आए।

उसने धीमे लेकिन कांपते स्वर में कहा, “आपके पिताजी आखिरी वक्त तक डायरी में आपका नंबर ढूंढते रहे…”

निखिल चुप रहा।

“शायद उन्हें सिर्फ आपकी आवाज सुननी थी।”

उधर से कोई जवाब नहीं आया।

आर्या ने फोन काट दिया। अगले दिन अंतिम संस्कार में मोहल्ले के लोग थे… पड़ोसी थे… एंबुलेंस वाला था… लेकिन उनका बेटा नहीं था।

चिता जल रही थी और आर्या की आंखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था— एक बूढ़ा आदमी… कांपते हाथों से डायरी पकड़े… आखिरी सांस तक अपने बेटे को ढूंढता हुआ…

अचानक उसे लगा, दुनिया में सबसे दर्दनाक मौत भूख या बीमारी से नहीं होती…

सबसे दर्दनाक मौत होती है— अपनों के इंतजार में।

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