कुसुम - एक अनसुनी दास्तान ( भाग-01 )|Hindi Kahani | Moral Story in hindi
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आँगन की गौरैया
गाँव की पगडंडियों पर जब सुबह की पहली किरण पड़ती थी, तो 'अतरौली' गाँव की सोई हुई किस्मत जैसे जाग उठती थी। इसी गाँव के एक छोर पर बना था मिट्टी का वो छोटा सा घर, जिसकी दीवारों पर सफेदी तो पुरानी हो चुकी थी, लेकिन वहाँ के माहौल में जो खुशबू थी, वो किसी महल में भी मयस्सर नहीं थी। उस घर की जान थी— कुसुम।
18 साल की कुसुम, जिसके चेहरे पर भोलापन और आँखों में बड़े-बड़े सपने तैरते थे। कुसुम जब मुस्कुराती, तो लगता जैसे खेत में सरसों के पीले फूल खिल उठे हों। लेकिन इस मुस्कुराहट के पीछे एक गहरा दर्द भी छिपा था—बचपन में ही सिर से माँ-बाप का साया उठ जाना।
"कुसुम! अरी ओ कुसुम... देख तो सूरज सिर पर आ गया और तेरी पढ़ाई खत्म नहीं हुई?" भाभी सुनीता ने रसोई से हाथ पोंछते हुए आवाज दी।
कुसुम ने अपनी ग्रेजुएशन की सेकंड ईयर की किताब से नजरें हटाईं और शरारत से बोली, "भाभी, अगर मैं कलेक्टर बन गई न, तो आपको काम करने के लिए दो-दो नौकरानियाँ ला कर दूंगी।"
पीछे से भाई संदीप कंधे पर कुदाल रखे दाखिल हुए। पसीने से लथपथ चेहरा, लेकिन बहन की बात सुनते ही थकान जैसे हवा हो गई। "नौकरानियों की जरूरत नहीं है मेरी लाडो को, बस तू पढ़-लिख कर इस भाई का नाम रोशन कर दे। मेरे पास ज्यादा धन-दौलत तो नहीं है, पर तेरी पढ़ाई में कभी कमी नहीं आने दूंगा।"
संदीप गाँव का एक साधारण मजदूर था। कभी किसी के खेत में काम करता, तो कभी शहर जाकर दिहाड़ी लगाता। उसकी पूरी दुनिया कुसुम और सुनीता के इर्द-गिर्द सिमटी थी।
उसी दोपहर, कुसुम अपनी सहेली अंजलि के साथ कॉलेज से लौट रही थी। अंजलि और कुसुम की दोस्ती ऐसी थी कि लोग उन्हें सगी बहनें समझते थे। तभी रास्ते के मोड़ पर बने पुराने पीपल के पेड़ के नीचे उसे देखकर कुसुम के कदम ठिठक गए।
वहाँ भोलू बैठा था।
भोलू—जिसके नाम से गाँव के शरीफ लोग रास्ता बदल लेते थे। गंदे कपड़े, अस्त-व्यस्त बाल और मुँह में हमेशा दबा रहने वाला पान मसाला। जब वो बोलता, तो उसके सुर्ख लाल दाँत किसी डरावने मंजर की तरह दिखते थे। उसके हाथ में हमेशा एक डंडा रहता और पीछे चार-पांच लड़कों की टोली, जो खुद को उसका 'गैंग' कहती थी।
"अरे ओ कुसुम! आज बड़ी जल्दी में हो? थोड़ा रुक के दो बातें हमारे साथ भी कर लो," भोलू ने अपनी घिघियाती आवाज में कहा और एक लंबी पीक नीचे फेंकी।
कुसुम ने नजरें झुका लीं। उसे भोलू से नफरत नहीं थी, बल्कि उसे देखकर घिन आती थी। अंजलि ने उसका हाथ जोर से पकड़ा, "चल कुसुम, ध्यान मत दे। ये तो है ही मवाली।"
भोलू अपनी जगह से उठा और कुसुम का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया। उसके साथियों ने हँसना शुरू कर दिया। भोलू की आँखों में एक अजीब सी चमक थी—वो कुसुम को चाहता था, लेकिन उसका चाहने का तरीका किसी दरिंदे से कम नहीं था।
"सुन कुसुम, तू कितनी भी बड़ी पढ़ैया क्यों न हो जाए, एक दिन तो तुझे इसी भोलू के घर की शोभा बढ़ानी है। तू बस हाँ कर दे, तेरा भाई जो दिन-भर पसीना बहाता है न, उसे पूरी जिंदगी बिठा के खिलाऊँगा।"
कुसुम को गुस्सा आ गया। उसने हिम्मत जुटाई और भोलू की आँखों में आँखें डालकर कहा, "भोलू, इंसान की औकात उसके पैसों से नहीं, उसके चरित्र से होती है। तुम और मैं? हम कभी एक नहीं हो सकते। तुम मेरा 'परफेक्ट मैच' कभी नहीं बन सकते। मेरे और तुम्हारे बीच जमीन और आसमान का फर्क है।"
भोलू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, पर वो कुछ बोला नहीं। उसने बस कुसुम को जाते हुए देखा। उसके एक साथी ने कहा, "भाई, ये तो बहुत उड़ रही है। पंख काट दें इसके?"
भोलू ने उसे एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। "खबरदार जो उसे हाथ भी लगाया! वो मेरी है, और उसे मैं अपनी मर्जी से हासिल करूँगा, जबरदस्ती से नहीं।"
रात को घर पर सन्नाटा था। संदीप और सुनीता बातें कर रहे थे। तभी घर के दरवाजे पर एक दस्तक हुई। दरवाजे पर संदीप का एक दूर का रिश्तेदार, मामा दयाराम खड़ा था। दयाराम के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी।
"संदीप बेटा, तेरी बहन अब जवान हो गई है। कब तक उसे ऐसे ही कुँआरा रखेगा? मेरे पास एक बहुत बड़े घर का रिश्ता है। शहर के पास वाले बड़े गाँव के सरपंच रमेश बाबू का बेटा, रोहित। लड़का शहर में पढ़ता है, इकलौता वारिस है। अगर ये शादी हो गई, तो कुसुम रानी बन कर रहेगी।"
संदीप असमंजस में था। "मामा जी, अभी तो वो पढ़ रही है। और हम छोटे लोग, सरपंच के घर में..."
"अरे छोटा-बड़ा क्या! उन्होंने फोटो देखी है, लड़की उन्हें पसंद है। संदीप, ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा।"
कुसुम ने कमरे के बाहर से ये सब सुन लिया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे शादी नहीं करनी थी, उसे पढ़ना था। लेकिन भाई के चेहरे पर आई खुशी की चमक देख कर उसका गला रुँध गया। उसे नहीं पता था कि ये रिश्ता उसके जीवन के सबसे बड़े अंधेरे की शुरुआत होने वाला है।
उधर, शहर के एक आलीशान बार में, रोहित एक लड़की की कमर में हाथ डाले जाम छलका रहा था। "रोशनी डार्लिंग, बस कुछ दिन और। पिताजी ने गाँव की किसी गँवार लड़की से रिश्ता तय किया है। उसे फँसाकर ज़मीन जायदाद अपने नाम करवा लूँ, फिर वो लड़की भी मेरी और तुम भी मेरी!"
क्या कुसुम अपनी किस्मत के लिखे को बदल पाएगी? या रोहित का ये ज़हरीला जाल उसे हमेशा के लिए खत्म कर देगा? अगले भाग में देखिए—रोहित और कुसुम की पहली मुलाकात और वह भयानक 'कर्फ्यू' की रात।
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