खामोशी का बोझ - Hindi Kahani | Moral Story in hindi

खामोशी का बोझ - Hindi Kahani | Moral Story in hindi

Hindi Story 


राघव को कभी नहीं लगा था कि वह अपनी ही पत्नी पर शक करने लगेगा। उसे हमेशा भरोसा रहा था कि वह रिश्तों को समझने वाला, पढ़ा-लिखा और संतुलित इंसान है। उसे लगता था कि शक करना कमज़ोर दिमाग़ की निशानी है। लेकिन ज़िंदगी अक्सर वही करवाती है, जिसके बारे में हम सबसे ज़्यादा निश्चिंत होते हैं कि “मेरे साथ ऐसा कभी नहीं होगा।”

अनन्या से उसकी शादी को पाँच साल हो चुके थे। उनकी शादी बड़ी नहीं थी। अनन्या की माँ का देहांत शादी से ठीक एक साल पहले हो गया था और उसके पिता उस सदमे से पूरी तरह टूट चुके थे। डॉक्टरों ने साफ़ मना किया था कि वे यात्रा नहीं कर सकते। इसी वजह से शादी शहर से बाहर, बहुत सीमित लोगों में, एक मंदिर में हुई थी। अनन्या के पिता न शादी में आए थे, न किसी रस्म में, न ही किसी तस्वीर में। उस वक़्त राघव ने इस बात को ज़्यादा तूल नहीं दिया। उसे लगा, परिस्थितियाँ हैं, हालात हैं। उसने कभी ज़िद नहीं की, कभी जानने की कोशिश नहीं की।

शादी के बाद भी अनन्या के पिता से उसकी कोई मुलाक़ात नहीं हुई। इसका एक और कारण था, जिसे राघव अच्छी तरह जानता था, पर उस पर बात करना उसने हमेशा टाल दिया। उसके पिता और अनन्या के पिता के बीच बीस साल पुराना बिज़नेस विवाद था। उस विवाद में अनन्या के पिता ने सब कुछ खो दिया था और राघव के पिता ने कभी उसे अपनी गलती नहीं माना। घर में अक्सर यह बात तंज़ के रूप में उछाली जाती थी—“कुछ लोग रिश्तों के लायक नहीं होते।” अनन्या हर बार यह सुनकर चुप रह जाती थी। राघव ने उस चुप्पी को कभी पढ़ने की कोशिश नहीं की।

शुरुआती सालों में सब ठीक था। अनन्या समय पर घर आती, राघव का ध्यान रखती, घर को घर बनाए रखती। वह बहुत ज़्यादा बोलने वाली औरत नहीं थी, लेकिन उसकी मौजूदगी से घर में एक ठहराव रहता था। राघव को यही अच्छा लगता था। उसे लगता था कि कम बोलने वाली पत्नी कम झंझट वाली होती है।

फिर धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा। अनन्या देर से आने लगी। पहले छह बजे, फिर सात, कभी-कभी साढ़े सात। राघव ने एक-दो बार यूँ ही पूछ लिया। जवाब हमेशा छोटा होता—“काम बढ़ गया था,” या “थोड़ा बाहर रुकना पड़ा।” पहले यह जवाब सामान्य लगे, फिर एक जैसे लगने लगे, और फिर खटकने लगे।

एक दिन राघव ने देखा कि अनन्या फोन पर किसी से बात कर रही थी। उसे देखते ही उसने कॉल काट दी। “कौन था?” राघव ने सामान्य लहज़े में पूछा। “बस… एक ज़रूरी बात थी,” अनन्या ने कहा। उस “बस” में राघव को बहुत कुछ छुपा हुआ लगा। उसी रात वह देर तक सो नहीं पाया। उसके दिमाग़ में सवाल घूमते रहे—अगर बात ज़रूरी थी तो नाम बताने में क्या हर्ज़ था?

धीरे-धीरे वह अनन्या को गौर से देखने लगा। उसके कपड़े, उसका तैयार होना, उसका कभी-कभी बिना वजह चुप हो जाना। अनन्या के लिए ये सब सामान्य था, लेकिन राघव के दिमाग़ में हर चीज़ शक का रंग लेने लगी। उसने कभी सीधे आरोप नहीं लगाया, लेकिन उसके शब्द बदलने लगे। “आजकल घर से ज़्यादा बाहर मन लगता है,” “इतना संवर कर किससे मिलने जाती हो?” वह हँस कर बोलता, लेकिन हँसी में ज़हर होता। अनन्या हर बार चुप रह जाती।

उसकी चुप्पी राघव को और चिड़चिड़ा बनाती। उसे लगता, अगर वह निर्दोष होती तो जवाब देती, सफ़ाई देती, लड़ती। चुप रहना उसे गुनाह जैसा लगने लगा। राघव ने कभी हाथ नहीं उठाया, कभी ऊँची आवाज़ में गाली नहीं दी, लेकिन उसने सवालों से, तानों से, और खामोशी से उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वह देर से घर आता, बिना बताए प्लान बदल देता, जैसे यह जताना चाहता हो कि उसे भी फर्क नहीं पड़ता।

एक शाम उसने गली के मोड़ पर एक बुज़ुर्ग को देखा। उम्र पचपन-साठ के बीच होगी। चाल लड़खड़ाती हुई, कपड़े साधारण। वह अनन्या के पीछे-पीछे थोड़ी दूरी पर चल रहा था। राघव ने उस वक़्त ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन अगले हफ्ते फिर वही चेहरा दिखा। फिर एक बार और। अब राघव का दिमाग़ पूरी तरह यक़ीन करने लगा कि अनन्या कुछ बड़ा छुपा रही है।

उसने उस आदमी को पहचानने की कोशिश की, लेकिन पहचान कैसे करता? उसने अपने ससुर को कभी देखा ही नहीं था। न तस्वीरों में, न शादी में, न किसी पारिवारिक मौके पर। उसे बस इतना दिखता था कि एक अनजान आदमी उसकी पत्नी की ज़िंदगी में बार-बार नज़र आ रहा है।

राघव अब इंतज़ार करने लगा। उसे लगने लगा कि एक दिन वह उसे रंगे हाथों पकड़ लेगा। वह जानबूझकर कहता कि उसे देर होगी, लेकिन समय से पहले लौट आता। कभी अचानक छुट्टी ले लेता। हर बार कुछ नहीं मिलता, लेकिन उसका गुस्सा और शक बढ़ता गया।

एक रात उसने साफ़ कह दिया, “मैं सब समझता हूँ, अनन्या। तुम कब तक छुपाओगी, यही देखना है।” अनन्या की आँखें भर आईं। उसके होंठ काँपे, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उस चुप्पी में एक डर था, जो राघव को दिखा नहीं।

वह दिन शनिवार का था। राघव ने कहा कि उसे ज़रूरी काम से बाहर जाना है और देर हो जाएगी। अनन्या ने बस सिर हिलाया। राघव घर से निकला, लेकिन दूर नहीं गया। वह पास ही रुक गया, जैसे किसी अपराधी का पीछा कर रहा हो। शाम होते-होते वही बुज़ुर्ग आदमी गली में दिखाई दिया। इस बार वह सीधा उनके घर की ओर आया। अनन्या ने दरवाज़ा खोला, उसे सहारा दिया और अंदर ले गई।

राघव का सब्र टूट गया। उसके अंदर महीनों से जमा शक और गुस्सा एक साथ फूट पड़ा। उसने दरवाज़ा खोला और बिना कुछ सोचे समझे अंदर घुस गया। “बस बहुत हुआ!” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

कमरे में कोई आपत्तिजनक दृश्य नहीं था। कोई नज़दीकी नहीं, कोई अपराध नहीं। एक व्हीलचेयर रखी थी, और उस पर बैठा एक बूढ़ा आदमी, जिसकी आँखों में डर और शर्म थी। अनन्या सन्न खड़ी थी।

“कौन है ये?” राघव ने तीखे स्वर में पूछा।

अनन्या कुछ बोल पाती, उससे पहले उस आदमी ने काँपती आवाज़ में कहा, “मैं… मैं इसका पिता हूँ।”

राघव को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर कुछ तोड़ दिया हो। उसका दिमाग़ सुन्न हो गया। उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे। अनन्या ने गहरी साँस ली, जैसे किसी भारी बोझ को उतार रही हो। “मैं तुम्हें बताना चाहती थी,” उसने कहा, “लेकिन हर बार डर गई।”

उसने बताया कि उसके पिता अब अकेले नहीं रह सकते। माँ के जाने के बाद उनकी हालत बिगड़ती गई। ऊपर से पुराना विवाद, पुरानी नफ़रत। वे जानते थे कि इस घर में आना आसान नहीं है। अनन्या उन्हें छुपा कर नहीं रख रही थी, बल्कि खुद ढाल बनकर खड़ी थी, ताकि उसका घर बचे।

बूढ़े पिता की आँखों से आँसू बह निकले। “मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से मेरी बेटी का घर टूटे,” उसने कहा। “मैं तो बस… उसे देख लेना चाहता था।”

राघव कुर्सी पर बैठ गया। उसे याद आया कि कैसे उसने कभी जानने की कोशिश नहीं की। उसने सवाल तो किए, लेकिन सही समय पर नहीं, सही ढंग से नहीं। उसने शक किया, पर समझने की कोशिश नहीं की। उसे एहसास हुआ कि उसने अपनी पत्नी को नहीं, अपनी ही अधूरी जानकारी और अपने पिता की नफ़रत के साये को दोषी ठहराया था।

वह धीरे-धीरे अनन्या के सामने झुका। “मुझे माफ़ कर दो,” उसकी आवाज़ टूट चुकी थी। “मैंने तुम्हारी चुप्पी को गुनाह समझ लिया।”

अनन्या पहली बार खुलकर रोई। उस रोने में दर्द भी था और राहत भी। उस दिन के बाद बहुत कुछ बदला। राघव ने अपने ससुर को सम्मान दिया, उनके इलाज की ज़िम्मेदारी ली, और सबसे ज़रूरी—उसने सुनना सीखा। वह समझ गया कि हर चुप्पी झूठ नहीं होती। कुछ चुप्पियाँ रिश्तों को बचाने के लिए ओढ़ी जाती हैं।

और राघव ने यह भी जाना कि जब हम किसी और को रंगे हाथों पकड़ने निकलते हैं, तो कई बार सबसे पहले अपनी ही गलती हमारे सामने आ खड़ी होती है।

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