अब यह घर बेटे के सहारे नहीं, बेटी के कंधों पर चलेगा - Hindi Kahani | Moral Story in hindi
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अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद सुधा ने पहली बार महसूस किया था कि “घर” अब सिर्फ दीवारों और छत का नाम नहीं रहा, बल्कि एक जिम्मेदारी बन चुका है।
मां की आंखों में हर वक्त ठहरी हुई चिंता, छोटे भाई-बहनों के मासूम सवाल—
“दीदी, पापा कब आएंगे?”
इन सवालों का कोई जवाब उसके पास नहीं था।
पिता के जाने के बाद मां दर-दर भटक रही थी—कभी रिश्तेदारों के दरवाजे, कभी साहूकार, कभी किसी जान-पहचान वाले के पास।
ये सब देखना सुधा से सहन नहीं हुआ।
वह घर की सबसे बड़ी बेटी थी, और उसी दिन उसने मन ही मन फैसला कर लिया—
अब यह घर बेटे के सहारे नहीं, बेटी के कंधों पर चलेगा।
काफी कोशिशों, रिजेक्शन और इंटरव्यू के बाद आखिरकार उसे एक नौकरी मिल ही गई।
नौकरी अच्छी नहीं थी, तनख्वाह भी बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन हालात से लड़ने के लिए वही काफी थी।
दिक्कत बस इतनी थी कि कंपनी घर से बहुत दूर थी।
हर सुबह उसे पहले शेयरिंग ऑटो लेना पड़ता, जो उसे बस अड्डे तक पहुंचाता।
फिर लगभग डेढ़ घंटे का बस का सफर, और शाम को वही थकान भरा रास्ता वापस।
मगर जब वह मां के चेहरे पर राहत और भाई-बहनों की मुस्कान देखती, तो सारी थकान अपने आप उतर जाती।
दो महीने बीत चुके थे।
सबकुछ धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा था।
लेकिन आज का दिन अलग था।
दोपहर से शुरू हुई बारिश शाम तक थमने का नाम नहीं ले रही थी।
जब सुधा की ड्यूटी खत्म हुई, तब भी बारिश लगातार गिर रही थी—मानो आसमान भी उसके संघर्ष पर रो रहा हो।
भीगे कपड़ों में वह जैसे-तैसे बस स्टैंड पहुंची।
एक घंटा बीत गया, लेकिन कोई बस नहीं आई।
कंधे पर लटका बैग भारी लग रहा था, पैरों में दर्द था, और मन में डर।
आखिरकार बस आई भी तो हालत और बदतर थी।
बस में औरतें कम, पुरुष ज्यादा थे।
भीगे कपड़े शरीर से चिपके हुए थे और कई निगाहें उसे ऐसे घूर रही थीं जैसे वह इंसान नहीं, कोई चीज़ हो।
उस पल उसे मां की चेतावनी याद आई— “बेटी, देर हो जाए तो कहीं रुक जाना, पर संभलकर।”
लेकिन देर से घर पहुंचना भी मना था।
घर में मां परेशान होती, छोटे भाई-बहन डर जाते।
बस जाम से जूझती रही।
डेढ़ घंटे का सफर ढाई घंटे में पूरा हुआ।
जब वह उतरी तो घड़ी नौ बजा चुकी थी—जबकि रोज़ वह साढ़े सात तक घर पहुंच जाया करती थी।
बस स्टैंड पर ऑटो नहीं था।
बारिश रुक चुकी थी, लेकिन सन्नाटा डरावना लग रहा था।
उसने वहां रुकने के बजाय पैदल चलना बेहतर समझा।
करीब सौ मीटर चली ही होगी कि एक साइकिल रिक्शा उसकी तरफ आता दिखा।
रिक्शा उसके पास आकर रुक गया।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
रिक्शा चलाने वाला बूढ़ा था—
सफेद बाल, झुकी हुई कमर, और लाल-लाल आंखें।
सुधा दुविधा में पड़ गई—बैठे या नहीं?
तभी रिक्शा चालक ने धीमी, मगर अपनत्व भरी आवाज़ में कहा—
“बिटिया, किस तरफ जाना है? आओ बैठो।”
न जाने क्यों, उसकी आवाज़ में डर नहीं, सुकून था।
सुधा ने घर का पता बताया और रिक्शा पर बैठ गई।
पूरे रास्ते वह चुप रही।
दिल में डर भी था और भरोसा भी।
करीब आधे घंटे बाद रिक्शा उसके घर के सामने रुका।
सुधा ने राहत की सांस ली।
पर्स से पैसे निकालते हुए वह बोली—
“बाबा, कितने पैसे हुए?”
रिक्शा वाले ने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया—
“नहीं बिटिया… पैसे नहीं लूंगा।”
सुधा चौंक गई—
“पर क्यों बाबा? ये तो आपकी रोज़ी-रोटी है।”
बूढ़ा आदमी गंभीर हो गया—
“हां बिटिया… कमाता तो हूं।
लेकिन जब से देश बहन-बेटियों की रूह कंपाने वाली खबरों से उबल रहा है ना…
तब से मैंने तय किया है—
हर रात आख़िरी सवारी किसी बहन या बेटी को सुरक्षित घर पहुंचाऊंगा।”
सुधा की आंखें भर आईं—“तो आप क्या कमाते हैं बाबा?”
वह मुस्कुराया--“सुकून, बिटिया।”
इतना कहकर वह रिक्शा मोड़कर चला गया।
सुधा देर तक वहीं खड़ी रही। भीगी हुई पलकों को पोंछते हुए उसने आसमान की तरफ देखा और बुदबुदाई—
“बाबा… ईश्वर आपकी कमाई में हमेशा बरकत बनाए रखे।”
उस रात सुधा समझ गई थी— इस दुनिया में भले अंधेरा बहुत है,
मगर कुछ लोग आज भी रोशनी बनकर चलते हैं। और शायद…
इन्हीं की वजह से उम्मीद अब तक जिंदा है।

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