रक्षा सूत्र - Hindi Kahani | Moral Story in hindi
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आज बाज़ार से सौदा लेने जाना है…
नीरा के हाथ तेज़ी से काम में लगे थे, मगर मन में चिंता की गति उससे कहीं तेज़ थी।
“जल्दी जल्दी निपटा लूं,” वह सोचती जा रही थी,
“गठिया के कारण अम्मा ज़्यादा काम कर नहीं पातीं… हम दोनों बहनें मिलकर संभाल ही लेंगी।”
घर की ऊपरी मंज़िल में उनका छोटा-सा स्कूल था—
जहाँ पहाड़ी घाटी के बच्चों की हँसी और स्लेट की खड़खड़ाहट गूंजती थी।
नीरा और मीरा, दोनों बहनें, मिलकर पढ़ाती थीं।
बाबा भी जहाँ ज़रूरत होती, मदद कर देते।
नीचे की मंज़िल पर बनी छोटी-सी दुकान से जो किराया आता, वही घर की रीढ़ था।
जीवन बड़ा नहीं था, मगर आत्मसम्मान से भरा हुआ था।
माता-पिता की चिंता इतनी गहरी थी कि दोनों बहनों ने अब तक शादी के बारे में सोचना भी टाल दिया था।
उन्हें लगता था—
पहले इन दो झुकी हुई कमरों को सहारा मिल जाए, फिर अपने सपनों की बारी आएगी।
बाज़ार से लौटते समय मीरा ने थकी आवाज़ में कहा—
“थक गए न दीदी?”
फिर खुद ही मुस्कुरा दी—
“बैठो, गरम-गरम कहवा बनाती हूँ… सारी थकान उतर जाएगी।”
अम्मा, बाबा, दीदी—सबको कहवा थमाते हुए मीरा के चेहरे पर वही अपनापन था,
जो पहाड़ों की ठंडी हवा में भी गर्माहट घोल देता है।
“अम्मा, रात के खाने में क्या बनेगा?”
“अरे… बन जाएगा,” अम्मा ने थकी हँसी के साथ कहा,
“थोड़ा सुस्ता तो ले।”
घाटी में अँधेरा जल्दी उतर आता है।
दिन ढलते ही घरों में चूल्हे बुझ जाते हैं और लोग ईश्वर के भरोसे सो जाते हैं।
सारा काम निपटाकर नीरा ने आँखें मूँदी ही थीं कि…
दरवाज़े पर हल्की-सी खटखट सुनाई दी।
नीरा की नींद टूट गई।
वह बिना हिले, साँस रोके सुनती रही।
कुछ पल बाद—
खटखट…
फिर और ज़ोर से—
खटखट… खटखट…!
अब मीरा भी उठ बैठी थी।
अम्मा और बाबा की नींद भी उड़ चुकी थी।
चारों के दिल एक साथ धड़क रहे थे—
ठंड के मौसम में भी पसीना बहने लगा।
काँपती आवाज़ में बाबा ने पूछा—
“क… कौन है? क्या काम है?”
बाहर से गाली भरी आवाज़ आई—
“दरवाज़ा खोल! नहीं तो तोड़ दूँगा!”
उस पल, घर की दीवारें भी डर से सिमट गईं।
बूढ़े माता-पिता, जवान दो बेटियाँ…
और बेटा ईश्वर ने दिया नहीं।
समझ नहीं आ रहा था—
किससे लड़ें, किससे बचें।
दरवाज़े पर लातें पड़ने लगीं।
पुराना, कमजोर दरवाज़ा ज़्यादा देर टिक न सका।
ज़ोरदार आवाज़ के साथ वह अंदर की तरफ गिर पड़ा।
नीरा और मीरा भागकर अंदर वाले कमरे में घुस चुकी थीं और कुंडी लगा ली थी।
दो गुंडे अंदर घुसे—
आँखों में खून, चेहरे पर हैवानियत।
एक अम्मा की ओर बढ़ा तो बाबा उनके सामने दीवार बनकर खड़े हो गए।
“क्यों परेशान कर रहे हो… क्या चाहिए?”
बाबा की आवाज़ गिड़गिड़ा रही थी।
एक गुंडा वीभत्स हँसी हँस पड़ा—
“तुझसे नहीं… तेरी बेटियों से काम है।”
अम्मा और बाबा उनके पैरों में गिर पड़े।
लेकिन उन्हें पैरों से धकेलते हुए वे दरिंदे अंदर के कमरे की ओर बढ़ गए।
नीरा-मीरा काँपते हाथों से पुलिस को फोन लगा रही थीं—
पर नेटवर्क…
जैसे भगवान ने भी साँस रोक ली हो।
भविष्य का अंधेरा सोचकर दोनों सिहर उठीं।
एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, आँखों से आँसू बहाते हुए,
ईश्वर के सामने अपनी इज्ज़त की दुहाई देने लगीं।
तभी—
धड़ाम!
दरवाज़ा टूट गया।
चीख उनके गले से निकल ही रही थी कि—
अचानक गुंडों की चीखें गूंज उठीं।
नीरा-मीरा ने आँखें खोलीं।
दरवाज़े पर—
भारतीय सेना के जवान।
बंदूक की नोक पर दोनों गुंडे ज़मीन पर पड़े थे।
किसी सपने की तरह।
दोनों बहनें फूट-फूटकर रोती हुई बाहर भागीं और उन जवानों के पैरों में गिर पड़ीं—
जिन्होंने सिर्फ उनकी जान नहीं,
उनकी आबरू बचाई थी।
कैप्टन साहब ने अपने हाथों से दोनों के कंधों पर दुपट्टा ओढ़ाया और बोले—
“डरिए मत… ये आतंकवादी हैं। हम काफी देर से इनके पीछे थे।
आपकी सुरक्षा के लिए थोड़ी देरी हुई… इसके लिए माफ़ी चाहते हैं।”
चारों ने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।
नीरा और मीरा ने अपने दुपट्टे का सिरा फाड़ा—
और उन वीर जवानों की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँध दिया।
नीरा की आवाज़ काँप रही थी—
“जिस देश की सेना इतनी सजग हो…
उस देश की बहनों की ओर कोई आँख उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता।”
उस रात घाटी में डर नहीं,
गर्व सोया था।
क्योंकि—
जब देश की सीमाओं पर ऐसे सपूत खड़े हों,
तो घरों में बहनें
बेफिक्र होकर
सो सकती हैं।
भारत की सेना पर हमें गर्व है। 🇮🇳

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